जब हम मैथ्यू हेनरी की टिप्पणी पढ़ते हैं तो वहां शुरुआत में ही वे यह लिखते हैं। वे लिखते हैं कि संत ओगस्टीन " परमेश्वर का नगर" पुस्तक 10 अध्याय 29 में कहते हैं कि उनके मित्र सिम्पलीसियस ने उन्हें बताया था कि उन्होंने एक प्लेटोनिक दार्शनिक को यह कहते सुना था कि संत यूहन्ना के सुसमाचार की ये शुरुआती पंक्तियां सोने के अक्षरों में लिखे जाने के योग्य थी। निःसंदेह इन पंक्तियों में बहुत वजन है क्योंकि ये तीन पंक्तियां एक ही साथ, एक ही समय और एक ही बार में हमारे उद्धारकर्ता येशु मसीह की शाश्वतता, पिता से उनका भिन्न व्यक्तित्व (यानी पिता एक अलग व्यक्ति है और वचन-प्रभु येशु एक अलग व्यक्ति है) और उनके ईश्वरत्व को बहुत ही सरल लेकिन मजबूती से प्रस्तुत करता है। लेकिन मेरा मानना है कि यदि हम इन पंक्तियों को अपने जीवन में दी जानेवाली महिमा और आदर न दे तो फ़िर भलेही हम इन्हें सोने या मोतियों से भी लिखे व्यर्थ ही होगा। और वो आदर और महिमा है प्रभु येशु का अपने हृदय पर पूरा अधिकार देना और उनके वचनों के अनुसार जीवन जीना।
चलिए अब हम सीधे अपनी टिप्पणी पे चलते हैं और जो दूसरी बातें है उनको वहां समझते हैं।

वचन (येशु मसीह) का पूर्व अस्तित्व

आदि में - यदि हम देखे तो पुराने नियम के शुरुआती शब्दों (उत्पत्ति 1:1- आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी बनाई) का संदर्भ यहाँ बिल्कुल स्पष्ट हमें देखने मिलता है। जो निःसंदेह समय की एक शुरुआत को दर्शाता हैं। यह बात और भी प्रभावशाली तब हो जाती है जब हम याद करते हैं कि एक यहूदी व्यक्ति 'उत्पत्ति' की पुस्तक को हमेशा 'बेरेशीत' कहकर ही पुकारता और बोला करता था, जिसका अर्थ है "आदि में"।

"आदि में" शब्दों का यूहन्ना और मूसा का लिखने और बात को प्रस्तुत करने का तरीका समान लगता है क्योंकि यह यहूदी लेखन और समानता से भरा हुआ है। इसलिए जब वह अपनी पुस्तक की शुरुआत “आदि में” शब्दों से करता है, तो यह बिल्कुल स्वाभाविक है। और यह मानना लगभग नामुमकिन है कि यूहन्ना ने अपने शब्द मूसा की पुस्तक के शुरुआती शब्दों को ध्यान में रखे बिना यूँही लिख दिए हों। दोनों ही अपनी पुस्तक की शुरुआत "आदि में" शब्दों से करते हैं लेकिन दोनों में जो फर्क है वो बस यह है कि मूसा अपनी "आदि में" परमेश्वर के पहेले सृजनात्मक कार्यों की महिमा को चिन्हित करते है, यूहन्ना भी अपने आप को उसी शुरुआती बिंदु पर रखते हैं लेकिन वो किसी भी शुरुआत या सृष्टि की बात करें उससे पहले " सृष्टिकर्ता के पूर्व अस्तित्व पर जोर देते है। वचन 1 से 14 से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि यह वचन और कोई नहीं येशु मसीह है।

वचन था - यहां वचन के लिए मूल भाषा (Greek-यूनानी) में जो शब्द उत्पन्न हुआ है वो लोगोस (Logos) है।

वचन परमेश्वर के साथ था - जब हम कहते हैं कि "वचन परमेश्वर के साथ था", तो हम केवल एक स्थान की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि एक शाश्वत सक्रिय संबंध की बात कर रहे हैं। ये शब्द सह-अस्तित्व (यानी एक ही समय पर, एक साथ अस्तित्व में होना। इसका मतलब है कि ऐसा कभी कोई समय नहीं था जब पिता थे और पुत्र नहीं थे। वे दोनों हमेशा से एक साथ रहे हैं। यह उस विचार को खारिज करता है कि पिता पहले आए और पुत्र बाद में पैदा हुए।) को व्यक्त करते हैं, लेकिन साथ ही साथ व्यक्तित्व के अंतर (यदि यूहन्ना कहते कि वचन परमेश्वर के "अंदर" था, तो इसका मतलब होता कि वे दोनों एक ही व्यक्ति हैं। लेकिन "साथ" कहकर यूहन्ना ने यह स्पष्ट कर दिया कि पिता और पुत्र का स्वभाव एक है, लेकिन वे दो अलग-अलग व्यक्ति हैं। यानी पिता जिसे यहां परमेश्वर कहा गया है वो और येशु जिसे वचन कहा गया है वे दोनों अलग अलग व्यक्ति हैं लेकिन उनका अस्तित्व एक ही है, इसलिए कोई ये ना समझे कि यहां दो ईश्वर है।) को भी। और क्योंकि परमेश्वर' स्वयं प्रेम है। और हम जानते हैं कि प्रेम के लिए कम से कम दो व्यक्तियों का होना ज़रूरी है—एक प्रेम करने वाला और एक जिससे प्रेम किया जाए। "परमेश्वर के साथ वचन" का होना यह दिखाता है कि दुनिया बनने से पहले ही परमेश्वर के भीतर प्रेम का एक पूर्ण चक्र चल रहा था। यही हमारे पवित्र बाइबल के परमेश्वर को सच्चा, और संपूर्ण भी बनाता है। क्योंकि मैं यदि अस्तित्व में एक हु और व्यक्तित्व में भी एक ही तो मैं प्रेम को कभी नहीं जान पाऊंगा और उसके लिए मुझे अपनी सृष्टि पर निर्भर होना पड़ता जो मेरे पूर्णता की कमी को दर्शाता है और ईश्वर ही है जो संपूर्णता का एकमात्र मानक है। (इसकी यूहन्ना 1:18 के "पिता की गोद में" और उत्पत्ति 1:26 के " चलों हम मनुष्य को बनाएं" से तुलना कर के देखे।)

इसको ऐसे भी समझा जा सकता है, परमेश्वर के आमने-सामने सिंहासन पर विराजमान," "परमेश्वर की ओर निरंतर निर्देशित दृष्टि", ( यहां एलीकोट "निरंतर निर्देशित" शब्द का उपयोग करते हैं। जिसको हम निम्न लिखित समझ सकते हैं।

  1. एकटक ध्यान
    इसका मतलब है कि मसीह (वचन) का ध्यान कभी भी अपने पिता से नहीं हटता। उनकी दृष्टि हमेशा पिता की ओर टिकी रहती है। जैसे एक प्रेमी अपनी प्रेमिका को या एक बच्चा अपनी माँ को बड़े ध्यान से देखता है, वैसे ही पुत्र का पूरा अस्तित्व पिता की ओर केंद्रित रहता है।

  2. पूरी तरह समर्पित
    "निर्देशित" होने का मतलब यह भी है कि मसीह की हर इच्छा, हर विचार और हर कार्य पिता की इच्छा के अनुसार है। वे पिता से अलग किसी और दिशा में नहीं देखते और न ही कुछ करते हैं। उनका पूरा जीवन पिता की ओर "मुड़ा हुआ" या "उन्मुख" है।

  3. अटूट लक्ष्य
    इसका एक अर्थ "लक्ष्य" भी है। पुत्र का एकमात्र लक्ष्य पिता को महिमा देना और उनकी संगति में रहना है। वह इधर-उधर नहीं भटकते, बल्कि उनकी दृष्टि एक सीधी रेखा की तरह हमेशा पिता परमेश्वर की ओर बनी रहती है।
    और इसके पूर्ण अर्थ को इससे कम शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।